जयपुर के बाहरी इलाक़े में एक छोटी कार्यशाला में भट्ठी की गर्मी और नीले-हरे रंगों की चमक के बीच 26 साल की रुबीना बानो अपने फ़ोन से एक फूलदान की तस्वीर ले रही हैं। उनका परिवार तीन पीढ़ियों से ब्लू पॉटरी बना रहा है, लेकिन बेचने का तरीक़ा अब बदल गया है।
पहले परिवार की ज़्यादातर बिक्री पर्यटकों और बड़े दुकानदारों पर निर्भर थी। पर्यटन कम होने पर कमाई ठप हो जाती थी। तीन साल पहले रुबीना और उनके भाई ने सोशल मीडिया पर पेज बनाया और दो ऑनलाइन बाज़ारों पर दुकान खोली।
रुबीना ने कहा, "अब हम बताते हैं कि एक प्लेट बनाने में कितने दिन लगते हैं, रंग कैसे बनता है। ग्राहक कहानी के साथ सामान ख़रीदता है, और मोलभाव कम होता है।"
क्या बदला
- परिवार की कुल बिक्री का करीब आधा अब ऑनलाइन होता है।
- दूसरे शहरों के कैफ़े और होटलों से थोक ऑर्डर आने लगे हैं।
- टूट-फूट से बचाने के लिए पैकिंग का नया तरीक़ा सीखा गया।
रुबीना के पिता अब्दुल रशीद मानते हैं कि शुरुआत में उन्हें शक था। "मुझे लगता था कि मिट्टी का काम हाथ से छूकर ही बिकता है। लेकिन बच्चों ने दिखा दिया कि अच्छी तस्वीर और ईमानदार बात भी भरोसा बनाती है।"
परिवार अब आसपास के चार और कारीगरों के उत्पाद भी अपनी ऑनलाइन दुकान पर बेचता है, और हर बिक्री पर उन्हें तय हिस्सा मिलता है।










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